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एक ऐसी जगह जहां घर तो पक्के हे लेकिन शौचालय पक्के हे , फिर भी उनका उपयोग नहीं करते हे

एक ऐसी जगह जहां घर तो पक्के हे लेकिन शौचालय पक्के हे , फिर भी उनका उपयोग नहीं करते हे

जिला मुख्यालय से 35 किमी दूर बसे कराहल ब्लॉक के अजनोई गांव में 116 आदिवासी परिवार रहते हैं। 116 घरों वाले इस गांव में एक भी पक्का मकान नहीं। सभी आदिवासी परिवार झोपड़ियों में रहते हैं। पक्के निर्माण के नाम पर गांव में करीब 60 शौचालय हैं।

करीब आधे परिवारों के यहां पक्के शौचालय बने हैं लेकिन, एक भी इनका उपयोग नहीं करता। अजनोई के आदिवासी परिवारों का कहना है कि, उन्हें पक्के शौचालय से ज्यादा जरूरत पक्के मकान की है। हर बारिश के बाद नई झोपड़ी बनानी पड़ती है। क्योंकि, पुरानी झोपड़ी के पत्ते बारिश में भीगने के बाद खराब हो जाते हैं।

ऐसी हालत केवल अजनोई गांव में नहीं है। जिले की तीनों ब्लॉक में करीब 250 गांव ऐसे हैं जहां के निवासियों को मुख्यमंत्री आवास, इंदिरा आवास या फिर पीएम आवास जैसी किसी योजना का लाभ नहीं मिलता। इनमें से कुछ गांवों में एक-दो पक्के मकान दिखते हैं,लेकिन उसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं।

शौचालयों पर लटके हैं ताले

अजनोई गांव में जगह-जगह पक्के शौचालय दिखते हैं। आदिवासियों अपनी झोंपड़ियों की रंगाई पुताई भले न की हो लेकिन, शौचालयों को अपनी-अपनी पसंद के रंग से पुताई की है। इसके बाद भी एक भी परिवार शौचालय का उपयोग नहीं करता। आधे से ज्यादा ने तो शौचालयों में ताले लगा रखे हैं। इसकी वजह यह है कि इस गांव में पीने के पानी का इतना संकट है कि, स्थानीय निवासी दो किमी दूर नदी में हुए एक गड्ढे से पीने का पानी लाते हैं।स्थानीय निवासियों का दो टूक कहना है कि, गांव में पीने के पानी के लिए दो किमी दूर जाना पड़ता है ऐसे में शौचालय के लिए पानी कहां से लाएं।

कुछ उदाहरण में ऐसे समझिए ग्रामीणों की परेशानी

श्योपुर-शिवपुरी हाइवे किनारे बसे कलमी-ककरधा गांव में एक भी हितग्राही को पीएम या अन्य किसी आवास योजना का लाभ नहीं मिला। बड़ौदा के राधापुरा ग्राम पंचायत के दो गांव बड़ौदिया बिंदी और मंडी गांव की आबादी 1050 से ज्यादा है लेकिन, दोनों गांवों में से एक परिवार को भी आवास योजना का लाभ नहीं मिला।

इनमें से कई गांवों में लोगों को जमीन के पट्टे, बीपीएल राशनकार्ड और शौचालय योजना का लाभ मिला लेकिन, आवास योजना से अब तक वंचित हैं।

इस कारण 200 गांवों में अधिकांश कच्चे घर

सरकार के एक नियम के कारण उन गरीबों को आवास योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा जिनको वास्तव में पक्के आवासों की जरूरत है। इसके पीछे की वजह सरकार को एक नियम है। उक्त नियम के तहत जो गांव आबादी घोषित होगा और राजस्व में दर्ज होगा उसे ही आवास जैसी बड़ी योजनाओं का लाभ दिया जाता है।

श्योपुर जिले में 250 से ज्यादा ऐसे मझरे-टोले हैं जिनमें हितग्राहियों को आवास योजना का लाभ नहीं दिया जा रहा। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार श्योपुर जिले में कुल 597 गांव हैं जिन्हें राजस्व गांव कहा जाता है।

इनका कहना है

हमारे यहां पत्थर-ईंट की बजाय लकड़ी की दीवार बनाकर झोपड़ी बनाई जाती है। ऊपर पत्तों की छत बनती है जो एक साल में दूसरी बनानी पड़ती है। शौचालयों से ज्यादा हमें पक्के घरों की जरूरत है,लेकिन हमारी कोई सुनता ही नहीं - रामसिंह आदिवासी अजनोई गांव

शौचालय तो पंचायत ने बनवा दिए लेकिन, पानी की सुविधा नहीं की। पीने का पानी भी नदी के गड्ढे से दो किमी चलकर लाते हैं। बिना पानी के गांव के लोग एक-एक महीने से नहाएं नहीं हैं, ऐसे में शौचालयों का उपयोग कैसे करें - सुमित्राबाई आदिवासी अजनोई निवासी

पीएम आवास के लिए आवेदन किया लेकिन, यह कहकर मना दिया कर दिया कि हमारा गांव राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं इसलिए, गांव मंे किसी को आवास स्वीकृत नहीं होते - का

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