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पाकिस्तान में इस तरह होती है पढ़ाई, सिर्फ केंटीन में लगती है क्लास

पाकिस्तान में इस तरह होती है पढ़ाई, सिर्फ केंटीन में लगती है क्लास

 ये फोटोज पाकिस्तान के हिल स्टेशन मुरे के एक मदरसे की हैं। देश में एजुकेशन सिस्टम और पढ़ाई का हाल किसी से छिपा नहीं है। देश में 2 लाख से ज्यादा स्कूल होने के बावजूद करीब 2 करोड़ बच्चे स्कूल तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। स्कूल पहुंचने वाले ज्यादातर बच्चे सिर्फ पेट भरने के लिए यहां का रुख कर रहे हैं।

 - इस्लामाबाद से 30 किमी दूर स्थित मुरे में ये अल नवादा मदरसा मौजूद है। इसने साउथ एशियाई नेशन में एजुकेशन का एक वैकल्पिक सिस्टम तैयार कर लिया है।

- इस मदरसे में आने वाले बच्चों को यहां रहने के साथ ही तीन टाइम खाने और पढ़ाई की सुविधा मिलती है।

-अल नवादा मदरसे के इरफान शेर के मुताबिक, यहां ज्यादातर लोग अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए स्कूल भेजते हैं, क्योंकि वो उन्हें पेटभर खिला नहीं सकते।

- हालांकि, देश के बाकी मदरसों की हालत अच्छी नहीं है। यहां प्राइवेट स्कूल्स, चैरिटेबल इंस्टीट्यूशंस और धार्मिक संस्थाएं सरकारी स्कूलों को मदद देकर 5 करोड़ बच्चों की जरूरतें पूरी करने में लगी हैं।

- पाक सरकार की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में 220,000 स्कूल हैं, लेकिन इसके बावजूद 2 करोड़ से ज्यादा बच्चे स्कूल का रुख तक नहीं कर पा रहे हैं।

- एजुकेशन कंसल्टेन्सी के मुताबिक, देश की सरकार स्कूलों की हालत सुधारने के लिए 2010 से हर साल एजुकेशन बजट 15 फीसदी बढ़ा रही है।

- यूनाइटेड नेशन के मुताबिक, पाकिस्तान का मौजूदा एजुकेशन बजट देश की जीडीपी का 2.65 फीसदी है। यानी 519 अरब रुपए के बजट में से हर स्टूडेंट पर करीब 10 हजार रु. खर्च हो रहे हैं।

- प्राइवेट एजुकेशन से जुड़े लोगों का मानना है कि देश में एजुकेशन को लेकर परेशानी फंड की कमी के चलते नहीं है, बल्कि नामुनासिब पढ़ाई के तरीके से हैं।

- मशाल स्कूल की फाउंडर जेबा हुसैन के मुताबिक, पढ़ाई का संबंध स्कूल की संख्या से नहीं है, बल्कि इसकी क्वालिटी और पढ़ाने के रवैये से है।

- फेडरल एजुकेशन डायरेक्टर तारिक मसूद ने खराब एजुकेशन के लिए टीचर्स के रवैये को जिम्मेदार बताया।

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