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पिता-दादा करते थे कांग्रेस की सेवा, आज CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ खड़ी है पार्टी!

पिता-दादा करते थे कांग्रेस की सेवा, आज CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ खड़ी है पार्टी!
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव नोटिस को राज्यसभा के उपसभापति वेंकैया नायडू ने खारिज कर दिया है. नायडू ने विपक्ष के आरोपों को महाभियोग के लिए उपयुक्त नहीं माना. जिसके बाद कांग्रेस अब वेंकैया नायडू पर सवाल उठा रही है. सवाल ये है कि कांग्रेस CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग क्यों लाना चाहती है? पिछले कुछ सालों में ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस ये कदम उठा रही है? ये सवाल इसलिए अहम हैं कि CJI दीपक मिश्रा का परिवार हमेशा से कांग्रेस के करीब रहा है. आजादी से पहले या फिर आजादी के बाद दीपक मिश्रा का परिवार लगातार कांग्रेस के साथ जुड़ा रहा है.

CJI दीपक मिश्रा के दादाजी एक स्वतंत्रता सेनानी थे. उनका नाम गोदाबरिश मिश्रा था. 1886 में जन्मे गोदाबरिश मिश्रा का देहांत 1965 में हुआ. उन्होंने अपने 5 दोस्तों के साथ मिलकर नया ओडिशा बनाने के लिए 'पंचसाखा' नाम से एक संगठन शुरू किया था. वे 1928 में पहली बार ओडिशा कांग्रेस के करीब आए. जिसके बाद 1941 (आजादी से पहले) गोदाबरिश मिश्रा को ओडिशा सरकार में पहला शिक्षा मंत्री बनाया गया.

CJI दीपक मिश्रा का परिवार और कांग्रेस!

जहां तक CJI दीपक मिश्रा की बात है तो उन्होंने शुरुआती स्कूली पढ़ाई ओडिशा के बानपुर स्थित गोदाबरिश विद्यापीठ से की. ये उनके दादा के नाम पर ही बना था. गोदाबरिश मिश्रा के तीन बेटे थे. बड़े बेटे लोकनाथ मिश्रा, जो स्वतंत्र पार्टी (सी राजागोपालचारी द्वारा स्थापित) के सदस्य थे. बाद में उन्होंने जनता पार्टी ज्वाइन कर ली. 1960 से 1978 के बीच लोकनाथ मिश्रा राज्यसभा सदस्य चुने गए. 1991 से 1997 के बीच वे अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और असम के राज्यपाल भी रहे. इस दौरान यानी 1991 से 1996 के बीच केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी.

दीपक मिश्रा के पिता थे कांग्रेसी विधायक

गोदाबरिश मिश्रा के दूसरे बेटे का नाम रघुनाथ मिश्रा था. ये भी कांग्रेस से जुड़े थे और बानपुर से विधायक भी चुने गए थे. CJI दीपक मिश्रा रघुनाथ मिश्रा के ही बेटे हैं.

दीपक मिश्रा के चाचा भी थे CJI

गोदाबरिश मिश्रा के सबसे छोटे बेटे रंगनाथ मिश्रा थे. जो 1990 में 14 महीने के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) रह चुके हैं. CJI दीपक मिश्रा का भी कार्यकाल 14 महीने का ही है. दीपक मिश्रा इसी साल 2 अक्टूबर को रिटायर होंगे.

रंगनाथ मिश्रा साल 1969 में ओडिशा हाई कोर्ट के जज नियुक्त किए गए थे. जिसके बाद 1981 में इन्हें ओडिशा हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया. BJD से राज्यसभा सांसद और सीनियर वकील पिनाकी मिश्रा रंगनाथ मिश्रा के ही बेटे हैं. जस्टिस रंगनाथ मिश्रा 1993 में NHRC के चेयरमैन नियुक्त किए गए. तब केंद्र में नरसिम्हा राव की अगुवाई में ही कांग्रेस की सरकार थी.

जमीन अधिग्रहण मामला

दरअसल कांग्रेस ने दीपक मिश्रा पर दो एकड़ जमीन अधिग्रहण का आरोप लगाया है. कांग्रेस के मुताबिक जस्टिस दीपक मिश्रा ने 1979 में एडवोकेट रहते हुए फर्जी एफिडेविट दिखाकर जमीन का अधिग्रहण किया था. एडीएम के आवंटन रद्द करने के बावजूद ऐसा किया गया था. हालांकि, साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद उन्होंने जमीन सरेंडर कर दी थी और मामला ओडिशा हाई कोर्ट में लंबित है. दीपक मिश्रा पर लगे आरोपों की जांच के बाद सीबीआई ने 2013 में ओडिशा हाईकोर्ट में अपनी रिपोर्ट सौंप दी.

कांग्रेस शासित राज्यों से दीपिक मिश्रा का नाता

1996 में पहली बार दीपिक मिश्रा ओडिशा हाई कोर्ट में एडिशनल जज नियुक्त किए गए थे. उस वक्त भी केंद्र और राज्य में कांग्रेस की सरकार थी, जेबी पटनायक ओडिशा के मुख्यमंत्री थे और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. इसके बाद 1997 में CJI दीपक मिश्रा मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में जज नियुक्त हुए. उस वक्त मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह थे.

2009 में जब दोबारा यूपीए सरकार चुनकर आई तो इस दौरान दीपक मिश्रा पटना हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बनाए गए. हालांकि इस वक्त बिहार में नीतीश कुमार की अगुवाई में NDA की सरकार चल रही थी. एक साल बाद यानी 2010 में दीपक मिश्रा दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बन गए. ये वो साल था जब केंद्र और राज्य में दोनों जगहों पर कांग्रेस की ही सरकार थी. इसके अगले साल अक्टूबर 2011 में जस्टिस दीपक मिश्रा सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए, तब भी केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी.

बड़े मामलों से दिए अहम फैसले

गौरतलब है कि सु्प्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बनाए जाने से पहले दीपक मिश्रा ने अहम मुद्दों पर अपने फैसले दिए. जिसमें 1993 बम ब्लास्ट मामले में याकूब मेमन को फांसी की सजा सुनाई. निर्भया गैंगरेप के दोषी को मौत की सजा सुनाई. इसके अलावा पिछले साल मई में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने आपराधिक मानहानि के प्रावधानों की संवैधानिकता को बरकरार रखने का आदेश सुनाया था. इस बेंच में जस्टिस मिश्र भी थे. यह निर्णय सुब्रमण्यन स्वामी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और अन्य बनाम यूनियन के केस में सुनाया गया था. बेंच का कहना था कि अभिव्यक्ति का अधिकार असीमित नहीं है. साथ ही पिछले साल 30 नवंबर को जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने आदेश दिया था कि पूरे देश में सिनेमा घरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान चलाया जाए.

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