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क्या लोकतंत्र से अपना हक मांग रहा हे , लैस दलित

क्या लोकतंत्र से अपना हक मांग रहा हे , लैस दलित
हजारों सालों से ‘मूक’ रहे ‘नायकों’ की जुबान जब खुलने लगी तो वो चुप कैसे रहते, जो सदियों से एक दमनकारी सामाजिक व्यवस्था के मार्गदर्शक और संरक्षक बने हुए थे. महाराष्ट्र में दलित उत्पीड़न के मुद्दे पर जो कुछ हुआ वो तो होना ही था.

एक तरफ वो थे जो दलित चेतना के वाहक हैं और दूसरी तरफ वो थे जो आज भी आदिम समय की चेतना को पहने घूम रहे हैं. ये टकराव अवश्यंभावी था और आने वाले दिनों में ये और तीक्ष्ण होगा, क्योंकि हजारों साल से सत्ता पर काबिज इतनी आसानी से सत्ता नहीं छोड़ेंगे.

यहां सवाल ये है ही नहीं कि भीमा कोरेगांव में क्या हुआ. कौन जीता और कौन हारा. कौन पेशवाशाही के साथ खड़ा था और कौन ईस्ट इंडिया कंपनी के लिये लड़ा था. या क्या ये संघर्ष देशभक्तों और देशद्रोहियों के बीच का है ? या फिर ये संघर्ष हिंदुत्व को बचाने का है ? 

ये संघर्ष एक प्रतिकार है जो लोकतंत्र में अपना हक मांग रहा है. जो आजादी के सत्तर साल बाद भी सम्मान से इंसान माने जाने का अधिकार मांग रहा है. जिग्नेश मेवाणी, रोहित वेमुला तो इस दलित चेतना के प्रतीक चिन्ह मात्र है.

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