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देश में यूरिया के लिए होने वाले आंदोलन कैसे थम गए? इसकी किल्लत कैसे दूर हुई?

देश में यूरिया के लिए होने वाले आंदोलन कैसे थम गए? इसकी किल्लत कैसे दूर हुई?
यूरिया की उपलब्धता को लेकर देश में अब कोई संकट नजर नहीं आता। इस यूरिया के लिए देशभर में कभी किसानों के बड़े आंदोलन होते थे। लेकिन अब हालत यह है कि 2012 से 2016 के बीच जिस यूरिया की बिक्री 30 से 30.6 मिलियन टन के बीच रही, इस साल वह घटकर 28 टन हो गई। संकट और किल्लत खत्म होने के दो कारण हैं। पहला- अब यूरिया पर 100 फीसदी नीम कोटिंग हो रही है। इससे बम बनाने जैसी गतिविधियों में यूरिया का गलत इस्तेमाल थम गया है। दूसरा- मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड जैसी योजना लागू करने के चलते यूरिया की खपत में गिरावट आई है। इस योजना के तहत मिट्‌टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटेशियम (एनपीके) स्तर को 4:2:1 पर लाना है।

यूरिया का आयात 1 साल में 7.25% घटा

- यूरिया की मांग 320 लाख टन है

- 50-70 लाख टन हर साल आयात करना होता है

- 226 लाख टन घरेलू उत्पादन

- 135 टन इस साल उत्पादन रहा

- 140 टन पिछले साल था

- 16 हजार रुपए प्रति टन उत्पादन पर खर्च होते हैं

- 5,360 रुपए प्रति टन कीमत पर बेचा जाता है

- 7.25% यूरिया का आयात कम हुआ

- पिछले साल 40 लाख टन आयात

- इस साल 37.10 लाख टन आयात

कैसे पूरी हुई कमी ?

इसके तीन बड़े कारण हैं - नीम कोटिंग, छोटे बैग और पुराने प्लांट दोबारा शुरू करना।

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