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SC का यह कदम लोगो के लिए असाधारण है, लेकिन इसका भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा .

SC का यह कदम लोगो के लिए असाधारण है, लेकिन इसका भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा .
बीते शुक्रवार का दिन भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में अभूतपूर्व था. जनता का न्याय की उम्मीद में न्यायालय पहुंचना स्वाभाविक है, लेकिन यह पहली बार हुआ कि न्यायाधीश ही न्याय की उम्मीद में जनता तक पहुंच गए. शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय के पांच वरिष्ठतम न्यायाधीशों में से चार ‘जनता की अदालत’ में पहुंचे. एक प्रेस कांफ्रेंस करते हुए इन लोगों ने देश के मुख्य न्यायाधीश पर कई गंभीर सवाल खड़े किये हैं.

शुक्रवार की इस घटना को कई नज़रियों से देखा जा रहा है. कुछ लोग इसे भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक ‘काले दिन’ की तरह से देख रहे हैं, कुछ इसे बिगड़ती न्याय व्यवस्था के सुधरने की दिशा में पहला कदम मान रहे हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो इस घटना में विपक्ष की साजिश तलाश रहे हैं. लेकिन इस सवाल पर चर्चा अब तक नहीं ही हुई है कि इस घटना का निटक भविष्य में क्या प्रभाव होगा. क्या देश के मुख्य न्यायाधीश - जो शुक्रवार की घटना के बाद सवालों के घेरे में हैं - को अपना पद त्यागना होगा? क्या जिन मामलों को बिगाड़ने के आरोप उन लग रहे हैं उन मामलों को सुधारा जा सकेगा? क्या न्याय व्यवस्था में कुछ ऐसे परिवर्तन हो सकेंगे जिनसे आने वाले समय में किसी मुख्य न्यायाधीश पर दोबारा इस तरह के आरोप लगने की संभावनाएं कम हो सकें? और क्या अब तक न्यायपालिका तक ही सीमित रहे इस मुद्दे से अब विधायिका भी प्रभावित होगी?

इन तमाम सवालों के जवाब तलाशने से पहले उस घटनाक्रम को समझना जरूरी है जिसके चलते शुक्रवार को हुई प्रेस कांफ्रेंस की नौबत आई. इसे समझने की शुरुआत शुक्रवार सुबह की घटनाओं से ही करते हैं. सुबह के दस बजे थे. जस्टिस चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ (मुख्य न्यायाधीश के बाद देश के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश) एक मामले पर चर्चा के लिए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के पास पहुंचे. यह मामला था सीबीआई जज बीएच लोया की संदेहास्पद मौत की जांच का. इस जांच के लिए इन दिनों सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका पर जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ में सुनवाई हो रही है.

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